Sunday, September 4, 2011

नक्सल फैक्टर : महंगाई ने बढाया 'लेवी' का रेट

कैसी मशालें लेके चले तीरगी में आप ,
जो रौशनी थी वो भी सलामत नहीं रही.....
दुष्यंत
महंगाई का असर केवल आम आदमी पर नहीं पड़ा है बल्कि कई और जगहों पर इसने खासा असर डाला है. सुनने में अजीब लगता है पर ये सच है की "नक्सलियों" पर भी इसका असर पड़ा है. ऐसे में वे भी अब अपनी कमाई बढाने वाले हैं. इसके लिए उन्होंने "लेवी" का रेट बढ़ा दिया है. जिससे उनकी कमाई बढ़ गई है. लेवी का काम बहुत बड़े पैमाने पर फैला हुआ है. सरकार को भी सब की जानकारी है. नक्सल प्रभावित इलाके के हर ठेके पर वसूली होती है. यही कारन है की इन इलाकों में निकलने वाले सरकारी टेंडर का रेट ज्यादा होता है. "लेवी" को ध्यान में रख के ये होता है. बिना इसके कोई काम यहाँ नहीं हो सकता. कुछ चीज़ों पे नक्सली छूट भी देते हैं ताकि स्थानीय लोगों का विश्वास जीत सकें.

करोणों की "लेवी" :
यह एक तरह से रंगदारी है. अपने असर वाले इलाके से नक्सली हर गतिविधि पर "टैक्स" लेते हैं. इन पैसों का उपयोग ये हथियार खरीदने, नक्सल लड़कों को पैसा देने और संगठन मज़बूत बनाने में लगाते हैं. झारखण्ड में 100 करोण से ज्यादा की वसूली होती है. अब ये वसूली 125  के करीब हो जायेगी.

यह है रेट : (  काम में होने वाली कमाई पर % में )
काम                                   पहले                             अब
माईन्स                                12                               15
क्रशर                                   14                               17
सड़क निर्माण                        15                                18
ब्रिज निर्माण                          17                               20
उद्योग                                 15 से 18                    20 से 22

इन पर देते हैं छूट :
इंदिरा आवास, स्कूल भवन, कुआँ, गाँव की सड़क, खेती और पंचायत भवन. 

Saturday, July 9, 2011

Friendship with ‘Trigger’

After every ‘Police encounter’ a segment of society  arouse questions about its ‘truth’. These People always claims that  (they have not any clue yet..) it is a ‘fake encounter’. Politicians and so called human right activists exaggerates the situation on account of ‘public opinion’. But question is, really ‘Aam Aadmi’ hate or like(appreciate ) these encounters? I am not going to debate(argue or public debate) on ‘what encounter is (right/wrong)’. I just want to understand that if this is ‘illegal killing ’ then why people ‘like’ this. ‘Encounter Specialists’ are real life hero for the public, no need to prove this.  Our Bollywood has always took benefit of this opinion and made numbers of hit films (Ab tak 56, Khaakee, Daband, Encounter, Satya…etc.etc.) on police encounters. Public likes ‘DABANG’ type image of Police. I am getting confused that  what exactly public want…..
 FACT :
Dr. Ajay kumar(ex IPS)  has won the Loksabha seat from Jamshedpur in by-election(4th July,11). He is well known as ‘encounter specialist’ and really he controlled crime in this city. Every body in steel city knows as ‘HERO’. This very man changed (?) not only the Political scenario of Jamshedpur but also of Jharkhand Politics. It was sitting seat (?) of CM Arjun munda(Mundada) who resigned before 6 months as MP. BJP claimed before by-election that they will get it back, but Dr. Ajay proved it as myth. His difference of win is much more than the votes, which contestant(BJP) got. Dr. Ajay is ‘Successful SP’ and only due to this image he made this difference. 
 TRUTH :
Actually Encounter described extra judicial killings in which Police stage ‘gun battles’ and shoot down suspected gangsters and terrorists. In India encounters were really started on large scale in Punjab police after 1980s to fight with separatist movement. And it gets popularity, when Mumbai police started it against Underworld. We have to accept this that only due to this, criminals rushed from country. No doubt that many police officers used this for there personal purpose also. 
 TRIGGER FREINDALY NAMES :
·       Inspector Pradeep Sharma- 113*
·       Sub-inspector Daya Nayak- 82
·       Inspector Praful Bhosle- 77
·       ASI Ravindra Angre- 51
·       ASI Sachin Hindurao- 63
·       Inspector Vijay Salaskar- 80
·       Inspector Mohan Chand Sharma- 75
(* all this numbers of encounters  are tentative. These are only from Mumbai and Delhi police)


Sunday, March 27, 2011

हर कदम पर ‘मौत’ कर रही इंतजार...


दोस्त, अपने मुल्क की किस्मत पे रंजीदा न हो,
उनके हाथों में है पिंजरा, उनके पिंजरे में सुआ।...दुश्यंत कुमार

जंगलों में सेना घुस चुकी है। एक बार फिर नक्सली निशाने पर हैं पर मौत हर कदम पर बिछी हुई है। कई तरह की माइंस नक्सलियों ने पूरे जंगल मे बिछा रखी है। झारखंड के ‘दांतेवाड़ा’ सारंडा के जंगलों में तीन दिनों तक सघन अभियान चला और भारी मात्रा में हथियार बरामद किए गए। इसके बाद अब जमशेदपुर की बारी है।
जमशेदपुर के घाटशिला ब्लाक की डायनमारी पहाड़ी में जैसे ही लांग रेंज पेट्रोलिंग(एलआरपी) सुरक्षा बलों  ने शुरू की, एक जवान शहीद हो गया। हमला डारेक्शनल माइन से किया गया था। इसके बाद एम्बुश लगाकर नक्सलियों ने फायरिंग भी की। गुरुवार से शनिवार तक पुलिस और नक्सलियों के बीच फायरिंग जारी रही। 
जाला बिछा के  घेरते हैं जवानों को :
नक्सली पहले जंगल के किसी गांव में मारपीट या गोलीबारी  करते हैं। इसके बाद सूचना पुलिस के पास आती है। पुलिस टीम जांच के लिए निकलती है तो रास्ते में उन्हें शिकार बनाने  की कोशिश की जाती है। एक दर्जन से ज्यादा पुलिस वाले सिर्फ जमशेदपुर में इसके शिकार हो चुके हैं।
आधुनिक ‘माइन’ से पटा जंगल :
नक्सलियों के पास अब सिर्फ लैंड माइन  का सहारा नहीं है। बल्कि जमीन के ऊपर से वार करने वाले डायरेक्शनल माइंस का प्रयोग बहुतायत हो रहा है। डायरेक्शनल माइन को पकड़ना काफी कठिन है और वार बहुत घातक। सीधे जवानों के सिर निशाने पर होते हैं। 
मेटल डिटेक्टर भी यहां हैं बेकार :
झारखंड के जंगलों में मेटल डिटेक्टर भी खास उपयोगी नहीं हैं। लौह अयस्क और अन्य मिनिरल्स से भरी इस जमीन पर मेटल डिटेक्टर को ऑन  करते ही सिग्नल्स आने लगते हैं। कच्ची सड़कों में कहीं माइन हो सकती है। पेड़ पर डायरेक्शनल माइन लगाई जा सकती है। बहुत मुश्किल है डगर...




Friday, March 11, 2011

दहशत के साए में सिपाही : दिन में भी थानों पर ताला


क्या खबर है, उनके दामन भी भड़क उठते हैं।
जो जमाने की हवाओं से बचाते हैं चिराग ।।

पूरा झारखंड नक्सल की आग में जल रहा है। दहशत का यह साम्राज्य लगातार बढ़ता जा रहा है। जंगलों से दहशत की दास्तां आ शहरों के किवाड़ खटखटाने लगी है। और यह दशहत राज्य के पुलिस थानों पर साफ झलकती है। सुरक्षा देने वाले ही मांदों में छिपे  बैठे हैं  ऐसे में आम जनता की स्थिति का अंदाजा भी लगाना मुश्किल है। उनकी मजबूरी है कि वे नक्सल के सामने नतमस्तक हों।
         दिन पर दिन नक्सली पहले से ज्यादा आर्गेनाइज हो रहे हैं। मोटी लेवी के जरिए उनकी आय लगातार बढ़  रही है ऐसे में जंगलों की भुलभुलैया से बाहर आकर शहरों में भी उन्होंने हस्तक्षेप करने की योजना बना ली है। हर बार की तरह इसा दफा भी पुलिस को निशाना बनाकर वे दहशत का साम्राज्य मज़बूत करने में लगे हैं।
        यदि सिर्फ पूर्व सिंहभूम की बात की जाए तो  यहां के करीब 30 थानों में से 15 थानें दहशत की जद में हैं. दिन के समय में भी यहां ताला लगा रहता है और यदि कोई फरियादी गलती से चला भी गया तो उसे संगीन का सामना करना पड़ता है। पूरी तफ्तीश के बाद ही वह बमुश्किल अंदर जा पाता है। शाम तीन बजे के बाद तो  शिकायत लेकर थानों पर जाना न-मुमकिन है। इन थानों में शहर से सटे  एमजीएम, सुंदरनगर और आजादनगर जैसे थाने भी हैं। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों के एक दर्जन थानों की यही स्थिति है। जब  पुलिस ही  खुद को इतना असुरक्षित महसूस कर रही है तो लोग कैसे सामान्य स्थिति में जी सकते हैं...?

Tuesday, January 11, 2011

पक्की सड़क पर भी दुनिया से कटा दिखा बचपन

हमारे साथ चल कर देख लें ये भी चमन वाले,,
यहाँ अब कोयला चुनते हैं फूलों से बदन वाले....राणा

Sunday, November 28, 2010

साहस को सलाम

लेहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
हिम्मत करने वालों की कभी हार नही होती..(बच्चन)

सांसे उखड़ रही थीं, शरीर से पसीना छूट रहा था। यह हार्ट-अटैक था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और ट्रेन में सवार करीब  दो हजार यात्रियों को सकुशल गंतव्य तक पहुंचाने के बाद ही अंतिम सांस ली। कर्तव्यपरायणता की यह मिसाल खड़गपुर रेल मंडल के ईएमयू(लोकल ट्रेन) चालक डीएन मोईत्रा ने पेश की है। आ वे इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन जीवन के अंतिम समय तक अपनी ड्यूटी पूरा करने की जजा लेकर मौत से लड़ने वाले इस मोटरमैन(ईएमयू चालक) को पूरा रेलवे सलाम कर रहा है। यदि उन्होंने हिम्मत नहीं दिखाई होती तो सैकड़ों यात्रियों की जान खतरे में पड़ सकती थी।
शनिवार की सुबह (27 नवम्बर ) यह हादसा उस वक्त हुआ जा मोईत्रा हावड़ा-पांशकूड़ा ईएमयू लेकर हावड़ा से चले थे।  ट्रेन के गंतव्य स्टेशन पहुँचते ही मोईत्रा, चालक यान से निकले और जमीन पर लड़खड़ा के गिर गए। उनका शरीर पसीने से तर था, चेस्ट में दर्द था और वे कांप भी रहे थे। ट्रेन के गार्ड के. मांडी को भी ट्रेन के चलते समय इसकी भनक नहीं लगी क्योंकि मोईत्रा ने किसी को दर्द का एहसास ही नहीं होने दिया। मांडी अभी मोईत्रा को संभालकर अस्पताल के लिए ले ही जाने लगे कि उन्होंने दम तोड़ दिया।
दबा सकते थे ‘डेड मैन हैंडिल’
ईएमयू में एक ही चालक होता है। उसे मोटरमैन कहते हैं। चालक के लिए एक विशेष हैंडिल ईएमयू में होता है जिसे ‘डेड मैन हैंडिल’ कहते हैं। इसे दबाये रखने के बाद ही टे्रन चलती है। यदि चालक बेहोशी आदि का शिकार होता है तो वह हैंडिल swatah  छूट जाता है और ट्रेन वहीं रुक जाती है। पर मोइत्रा ने ऐसा नहीं किया क्योंकि ट्रेन में सवार सैकड़ों यात्री बीच में फंस जाते। उनकी कर्तव्यपरायणा के आगे सभी दलीलें और तर्क बेमानी से लगती है।

Sunday, October 24, 2010

देर है, अंधेर भी...

करे इन्साफ की उम्मीद किससे,,
यहाँ मुंसिफ सभी बहरे हुए हैं.....(अज्ञात)

छतीसगढ़ के जांजगीर-चांपा की भरी अदालत में एक अनपढ़ ने जज को तीन सौ रुपये दे दिए, साथ में कहा की उसका मामला जल्दी निपटा दे. सभी आश्चर्यचकित हो गए, जज ने उसे घूस देने के आरोप में जेल भेज दिया. पर क्या अनपढ़ दुखुराम वाकई में दोषी है, उसका ये बयां ही काफी है उसकी और हमारे न्यायिक व्यवस्था की बेचारगी साबित करने के लिए..." गाँव में किसी ने कहा था की पेशी में पैसा दोगे तो काम जल्दी हो जाएगा...".
वास्तव में भारत में इस समय जहाँ एक तरफ इन्साफ मिलने में देर है वहीँ अंधेर भी. और कहा ही गया है की देर से मिला इन्साफ, नाइंसाफी के बराबर ही होता है. फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाई तो गईं हैं लेकिन कोई ख़ास लाभ नहीं मिल रहा है. 
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार लंबित मामलों को निपटने के लिए हाई कोर्ट में डेढ़ हज़ार और छोटी अदालतों में 23  हज़ार जजों की जरुरत है. भारतीय अदालतों में 30 मिलियन केसेस लंबित हैं.  साथ ही देश के 21 हाई कोर्ट्स में चार मिलियन मामले पड़े हैं. इनमे 70 प्रतिशत मामले सिविल के हैं. 
भारत में 10 लाख की आबादी पर 10 .5 जज हैं, जबकि इतनी ही आबादी पर बांग्लादेश में 12 ,  आस्ट्रेलिया में 41 , हंगरी में 70 , कनाडा में 75  और अमेरिका में 107  जज हैं. भारत में कम मानक के बाद भी भारी मात्रा में जजों के पद रिक्त हैं, जो एक चिंताजनक स्थिति है. दुखुराम ने कोई गलती नहीं की, मेरा माना है.....आपका ?