लोग ज़ालिम हैं, बहुत फिकरे उछालेंगे जरूर,,कोई खतरा है तो घर बैठिये, पर्दा कीजिये....'कुमार पाशी'
पर्दा, हिजाब, नकाब और ना जाने क्या-क्या. किसी ने तन ढंकने के लिए इसे किसी पर थोपा तो कोई इसी को जरिया बना कई लोग दिलों तक पहुँच गए. नए दौर में एक नई बहस इसी परदे को लेकर शुरू हुई है. कोई कह रहा है ये गलत है, कोई परंपरा के नाम पे इसे थोपना चाहता है. मुद्दा गरम है और काफी नाज़ुक भी. पर अब आवाजें उठ रही हैं और कुछ काम भी बढे हैं. एक तरफ डिजाइनर बुर्के और नकाब बाज़ार में हैं तो वहीँ पूरा शरीर दिखाने वाले कपडे भी खूब बिक रहे हैं.
मै यहाँ इस बहस में बिल्कुल नहीं पडूँगा कि, ...फ्रांस के संसद की निचली सदन ने सार्वजानिक स्थानों पर बुरका पहनने पर रोक सम्बन्धी कानून को मंजूरी दे दी है. इस कानून के तहत बुरका पहनने वाले पर 150 यूरो जुर्माना तो बुर्के के लिए मजबूर करने वालों पे 30 हज़ार यूरो का जुर्माना लगेगा... की ये ठीक है की खराब. ये बात अलग है की कुछ मुस्लिम विद्वान् ही कहते हैं की नकाब को कुरआन शरीफ में जरूरी नहीं बताया गया है, बल्कि यह सिर्फ सास्कृतिक पहचान है. इसी तर्क के साथ मिश्र में एक मौलवी ने भी स्थानीय विश्वविद्यालय में नकाब पे रोक लगा दी थी. फुटबाल का खिताब घर ले जाने वाले स्पेन के एक शहर बार्सिलोना में भी बुर्के पर प्रतिबन्ध लगा है. लेकिन फिर भी मै इस पर चर्चा नहीं करूँगा की ये गलत है या सही.
बुर्के के अलावा भी कई परदे जैसी चीज़ें हैं, इन्होने मेरा ध्यान आकर्षित किया है.....हिजाब, नकाब, खीमार, शाएला , चादर और अल-अमीर, बुरका तो है ही...
अब देखते हैं की चेहरे पर लगा पर्दा तो हट रहा है, अक्ल पर लगा कब हटेगा .. ?
2 comments:
विषय देखकर रवीश की रिपोर्ट याद हो आई.
विवेक जी आपकी पोस्ट हमेशा मेरा दिल जीत लेती हैं और इस बार भी वही हुआ...बहुत खूब लिखते हो आप. परदे के पीछे का राज़ तो आपने खोल ही दिया और साथ साथ विवेक के पीछे छुपा एक लेखक भी सामने आ गया...
एक कविता अपने नाम करता हूँ अपने शब्दों में...
आपकी हर पोस्ट में दीखता है आपका हुनर विवेक
आपके दिल की पुकार कहता है आपका हर लेख
बस यूँ ही लिखते रहना दोस्त अपने दिल से हमेशा
बहुत अच्छा लिखना ही रखना हमेशा अपना पेशा
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