Sunday, October 24, 2010

देर है, अंधेर भी...

करे इन्साफ की उम्मीद किससे,,
यहाँ मुंसिफ सभी बहरे हुए हैं.....(अज्ञात)

छतीसगढ़ के जांजगीर-चांपा की भरी अदालत में एक अनपढ़ ने जज को तीन सौ रुपये दे दिए, साथ में कहा की उसका मामला जल्दी निपटा दे. सभी आश्चर्यचकित हो गए, जज ने उसे घूस देने के आरोप में जेल भेज दिया. पर क्या अनपढ़ दुखुराम वाकई में दोषी है, उसका ये बयां ही काफी है उसकी और हमारे न्यायिक व्यवस्था की बेचारगी साबित करने के लिए..." गाँव में किसी ने कहा था की पेशी में पैसा दोगे तो काम जल्दी हो जाएगा...".
वास्तव में भारत में इस समय जहाँ एक तरफ इन्साफ मिलने में देर है वहीँ अंधेर भी. और कहा ही गया है की देर से मिला इन्साफ, नाइंसाफी के बराबर ही होता है. फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाई तो गईं हैं लेकिन कोई ख़ास लाभ नहीं मिल रहा है. 
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार लंबित मामलों को निपटने के लिए हाई कोर्ट में डेढ़ हज़ार और छोटी अदालतों में 23  हज़ार जजों की जरुरत है. भारतीय अदालतों में 30 मिलियन केसेस लंबित हैं.  साथ ही देश के 21 हाई कोर्ट्स में चार मिलियन मामले पड़े हैं. इनमे 70 प्रतिशत मामले सिविल के हैं. 
भारत में 10 लाख की आबादी पर 10 .5 जज हैं, जबकि इतनी ही आबादी पर बांग्लादेश में 12 ,  आस्ट्रेलिया में 41 , हंगरी में 70 , कनाडा में 75  और अमेरिका में 107  जज हैं. भारत में कम मानक के बाद भी भारी मात्रा में जजों के पद रिक्त हैं, जो एक चिंताजनक स्थिति है. दुखुराम ने कोई गलती नहीं की, मेरा माना है.....आपका ?

2 comments:

रोली पाठक said...

विवेक....ये खबर मैंने भी पढ़ी थी...तब आपने देश की कार्य प्रणाली, न्याय व्यवस्था पर शर्मिंदगी भी हुई थी...कुछ दिन पूर्व एक मित्र ने एक खबर टैग की थी, एक महिला का वर्षों से घर खाली करने का प्रकरण कोर्ट में विचाराधीन था, जो उसकी पैत्रक संपत्ति थी, उसने आत्महत्या कर ली, और सिस्टम को दोषी ठहराया....लखनऊ की खबर थी | वाकई, इन्साफ के मंदिर मेही देर और अंधेर दोनों होगी तो लाचार जनता कहाँ गुहार लगाएगी| आपकी तरह मै भी मानती हूँ, दुखुराम ने 300/-देने की पेशकश कर, हमारे तंत्र की दिखती राग पर हाथ रखा है.....धन्यवाद विवेक, समाज से जुड़े इस ज्वलंत मुद्दे पर विचार रखने के लिए...

Maan Sengar said...

विचार अच्छे है. अच्छा है सटीक बात कम शब्दों में कह दी है.